Detailed History of Laxmanjees Sweets Kandaghat
कंडाघाट से गुजरते समय यदि आपने कभी अपनी गाड़ी रोकी हो, तो बहुत संभव है कि किसी ने आपसे एक ही बात कही हो — “Laxmanjees की मिठाई लेते जाना।” आज यह नाम केवल एक दुकान नहीं, बल्कि लोगों की एक आदत बन चुका है। लेकिन इस मिठास के पीछे की कहानी उतनी सीधी नहीं है, जितनी दिखाई देती है।

इस कहानी की शुरुआत 1950–60 के दशक से होती है, जब श्री नंद किशोर वर्मा जी पंजाब से हिमाचल प्रदेश के कंडाघाट आए। उस समय उनका मुख्य कार्य स्वर्ण आभूषणों का था। परंतु उस दौर के नियमों और बाज़ार की परिस्थितियों के कारण उनका यह कार्य अधिक समय तक नहीं चल सका। ऐसे में उन्होंने साथ-साथ मिठाइयों का काम भी आरंभ किया—शायद तब किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि यही कार्य आगे चलकर उनकी पहचान बनेगा।
1960–70 के बीच जब उनके पुत्र श्री लक्ष्मण दास वर्मा जी इस व्यवसाय से जुड़े, तब इस दुकान ने धीरे-धीरे अपनी दिशा बदलनी शुरू की। उस समय यह “वर्मा स्वीट्स” के नाम से जानी जाती थी और मिल्क केक तथा कलाकंद जैसे उत्पादों के लिए प्रसिद्ध थी। कंडाघाट का स्थान भी यहाँ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है—शिमला और चंडीगढ़ के बीच होने के कारण यहाँ रुकने वाले यात्रियों ने बिना किसी प्रचार के इस दुकान को आगे बढ़ाया।
इसके बाद आता है एक महत्वपूर्ण मोड़—1970 के दशक के अंतिम वर्षों में, लगभग 1978 के आसपास, जब “वर्मा स्वीट्स” को एक नई पहचान दी गई और इसका नाम रखा गया “लक्ष्मणजीज़ स्वीट्स।” यह केवल नाम का परिवर्तन नहीं था, बल्कि सोच का भी परिवर्तन था—व्यवसाय को एक पारिवारिक विरासत के रूप में स्थापित करने का।
इसी समय अनिल वर्मा जी ने मिठाई के व्यवसाय को अपना मुख्य केंद्र बना लिया। आभूषणों का कार्य पीछे छूट गया और मिठाइयों ने पूरी जगह ले ली। उस समय का लक्ष्मणजीज़ आज के संगठित स्वरूप से बिल्कुल भिन्न था। यहाँ प्रत्येक दिन का अपना एक निर्धारित क्रम होता था—कभी बूंदी और सेवइयाँ, कभी जलेबी, और रोज़ के अनुसार चाय, पकौड़े तथा समोसे। सब कुछ ताज़ा बनता था, और सबसे विशेष बात यह थी कि यह सब ग्राहकों के सामने ही तैयार होता था।
उस समय न तो सोशल मीडिया था और न ही कोई विशेष विपणन रणनीति। केवल एक चीज थी—स्वाद। और वही स्वाद धीरे-धीरे लोगों के माध्यम से फैलता गया। बसें यहाँ रुकती थीं, लोग चाय पीते थे, मिठाइयाँ खाते थे, और आगे जाकर दूसरों को बताते थे। यह पूरा तंत्र मौखिक प्रचार पर आधारित था, और यही लक्ष्मणजीज़ की सबसे बड़ी ताकत बन गया।
हर कहानी में एक ऐसा उत्पाद होता है जो उसे नई पहचान देता है—Laxmanjees के लिए वह थी बेसन बर्फी। धीरे-धीरे यह एक ऐसी मिठाई बन गई, जिसके बिना लक्ष्मणजीज़ का नाम अधूरा लगता है। आज लोग इसे “कंडाघाट की बेसन बर्फी” के नाम से जानते हैं। इसका कारण केवल स्वाद नहीं, बल्कि वह निरंतरता है जो वर्षों से बनी हुई है।

इसके बाद आता है आधुनिक समय—वर्ष 2018। जब मनीष वर्मा जी, जो पहले PayPal में वरिष्ठ सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, अपनी नौकरी छोड़कर इस विरासत को संभालने के लिए वापस आए। यह निर्णय आसान नहीं था। एक कॉर्पोरेट जीवन को छोड़कर पारंपरिक व्यवसाय में आना—इसमें जोखिम भी था और दबाव भी। प्रारंभ में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने प्रणाली को समझा और उसमें अपने विचार जोड़े।
उनके आने के बाद लक्ष्मणजीज़ में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगा। व्यंजनों के मानकीकरण पर ध्यान दिया गया, पैकेजिंग में सुधार हुआ, स्वच्छता और उत्पादन प्रक्रिया को व्यवस्थित किया गया। मशीनों का उपयोग बढ़ाया गया, लेकिन स्वाद वही रखा गया जो वर्षों से लोगों की स्मृति में था। यह संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है—और उन्होंने इसे सफलतापूर्वक निभाया।
साथ ही नए उत्पाद भी प्रस्तुत किए गए—विशेष रूप से देसी घी से बनी मिठाइयाँ और आज की पीढ़ी के अनुसार संतुलित मिठाइयाँ। लेकिन एक बात जो आज भी समान है, वह है उनका सिद्धांत—केवल वही उत्पाद बनाना जिन्हें वे स्वयं उच्च गुणवत्ता के साथ तैयार कर सकें। बाहरी कारीगरों को लाकर मात्रा बढ़ाने के बजाय उन्होंने अपनी विधियों को ही सशक्त बनाया।

आज लक्ष्मणजीज़ एक छोटी सी दुकान से बढ़कर एक संगठित ब्रांड बन चुका है। यहाँ प्रशिक्षित कर्मचारी हैं, व्यवस्थित उत्पादन प्रणाली है, आधुनिक पैकेजिंग है, और ऑनलाइन डिलीवरी भी शुरू हो चुकी है। यातायात जैसी समस्याओं के समाधान के लिए फूड ट्रक तक की शुरुआत की गई है।
लेकिन इतने सारे परिवर्तनों के बाद भी एक चीज नहीं बदली—और वह है लोगों का विश्वास। आज भी जो व्यक्ति पहली बार यहाँ मिठाई का स्वाद लेता है, वह अक्सर वापस आता है। शायद इसी कारण लक्ष्मणजीज़ केवल एक मिठाई की दुकान नहीं, बल्कि कंडाघाट की पहचान बन चुका है—और धीरे-धीरे हिमाचल प्रदेश का एक गौरव भी।

